: ज्ञान , वैराग्य और तपस्या की देवी है मां ब्रह्मचारिणी - अरविन्द तिवारी
Mon, Oct 16, 2023
नई दिल्ली – नवरात्री में नौ दिनों तक माँ दुर्गा के अलग अलग स्वरूपों की पूजा होती है। हर दिन माँ के अलग अलग मंत्रों का उच्चारण करने और अलग अलग भोग लगाने से माँ प्रसन्न होकर मनोकामना पूरी होने का आशीर्वाद देती हैं। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि नवरात्रि के दूसरे दिन आज मांँ दुर्गा की नौ शक्तियों के दूसरे स्वरूप मांँ ब्रह्मचारिणी के दर्शन पूजन का विधान है। इस दिन साधक का मन ‘स्वाधिष्ठान ‘चक्र में शिथिल होता है। इस चक्र में अवस्थित मनवाला योगी उनकी कृपा और भक्ति प्राप्त करता है। देवी की कृपा से उसे सर्वत्र सिद्धि और विजय की प्राप्ति होती है। माँ ब्रह्मचारिणी के नाम का अर्थ – ब्रह्म मतलब तपस्या और चारिणी का अर्थ आचरण करने वाली देवी होता है। मां ब्रह्मचारिणी को ज्ञान , तपस्या और वैराग्य की देवी माना जाता है। कठोर साधना और ब्रह्म में लीन रहने के कारण भी इनको ब्रह्मचारिणी कहा गया है। ब्रह्मचारिणी रूप की आराधना से उम्र लम्बी होती है। मान्यता है कि इन देवी की आराधना से विवाह में आने वाली हर बाधा दूर हो जाती है। माँ दुर्गा का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धों को अनंत फल देने वाला है। इनका स्वरूप पूर्ण ज्योतिर्मय और अत्यंत भव्य , दिव्य रूप में होता है , इनके दाहिने हाथ में जप की माला और बायें हाथ में कमंडल लिये श्वेत वस्त्र में देवी विराजमान होती हैं। माँ ब्रह्मचारिणी पूजा , तप , शक्ति , त्याग , सदाचार , संयम और वैराग्य में वृद्धि करती है और शत्रुओं का नाश करती है। ये अक्षय माला और कमंडलधारिणी , शास्त्रों के ज्ञान और निगमागम तंत्र-मंत्र आदि से संयुक्त है। अपने भक्तों को वे अपनी सर्वज्ञ सम्पन्न विद्या देकर विजयी बनाती हैं। इस दिन ऐसी कन्याओं का पूजन किया जाता है कि जिनकी शादी तय हो गई है लेकिन अभी भी शादी नहीं हुई है। उन्हें अपने घर बुलाकर पूजन के पश्चात भोजन कराकर वस्त्र , पात्र आदि भेंट किये जाते हैं। नवरात्रि के दूसरे दिन मांँ को शक्कर और पंचामृत का भोग लगाने से लंबी आयु का वरदान मिलता है। नवरात्रि के दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा में हरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन लम्बी उम्र की कामना के लिये शक्कर का भोग लगाया जाता है। मां ब्रह्मचारिणी को दूध और दही का भोग लगाया जाता है। इसके अलावा चीनी , सफेद मिठाई और मिश्री का भी भोग लगाया जा सकता है। इसके साथ ही मां ब्रह्मचारिणी को मिश्री , चीनी और पंचामृत का भेग लगाया जाता है। इन्हीं चीजों का दान करने से लंबी आयु का सौभाग्य भी पाया जा सकता है। माता ब्रह्मचारिणी हमें यह संदेश देती हैं कि जीवन में बिना तपस्या अर्थात कठोर परिश्रम के सफलता प्राप्त करना असंभव है। बिना श्रम के सफलता प्राप्त करना ईश्वर के प्रबंधन के विपरीत है। अत: ब्रह्मशक्ति अर्थात समझने व तप करने की शक्ति हेतु इस दिन शक्ति का स्मरण करें। योग-शास्त्र में यह शक्ति स्वाधिष्ठान में स्थित होती है। अत: समस्त ध्यान स्वाधिष्ठान में करने से यह शक्ति बलवान होती है एवं सर्वत्र सिद्धि व विजय प्राप्त होती है। आज के दिन माँ के “या देवी सर्वभूतेषु मांँ ब्रह्मचारिणी रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥ इसके अलावा ब्रह्मचारिणी: ह्रीं श्री अम्बिकायै नम:।” मंत्र का जप किया जाता है। आईये अब हम आपको बताते हैं कि माँ दुर्गा के नवों रूपों की पूजा करते समय कौन सी रंग के कपड़ा पहनने चाहिये और माता को क्या भोग लगाना चाहिये -
पहले दिन माता शैलपुत्री की पूजा का विधान है , इस दिन पीले रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन माँ भगवती को घी का भोग लगाया जाता है ताकि हम निरोग रहें। दूसरे दिन ब्रह्मचारिणी की पूजा होती है , इस दिन हरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन लम्बी उम्र की कामना के लिये शक्कर का भोग लगाया जाता है। तीसरे दिन चंद्रघंटा की पूजा का विधान है इस दिन हल्के भूरे रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और समस्त दुखों के नाश के लिये माँ भगवती को दूध का भोग लगाया जाता है। चौथे दिन कुष्माण्डा की पूजा का विधान है इस दिन संतरा रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन देवी को मालपुआ का भोग लगाया जाता है पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा का विधान है इस दिन सफेद रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है एवं केला का भोग लगाया जाता है। छठवे दिन कात्यायनी की पूजा का विधान है इस दिन लाल रंग का कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और इस दिन शहद का भोग लगाया जाता है। सातवें दिन कालरात्रि की पूजा का विधान है इस दिन नीले रंग का कपड़ा पहनना शुभ है और इस दिन देवी को गुड़ या नींबू काटकर अर्पित किया जाता है। आठवें दिन महागौरी की पूजा का विधान है इस दिन गुलाबी कपड़ा पहनना शुभ माना जाता है और नारियल का भोग लगाया जाता है। नवरात्रि के अंतिम दिन माँ भगलती की पूजा सिद्धिदात्री के रूप में की जाती है इस दिन बैगनी रंग का कपड़ा पहनना शुभ होता है और देवी को अनार का भोग लगाना अत्यंत लाभदायक माना जाता है।मां ब्रह्मचारिणी कथापौराणिक कथा के अनुसार पूर्वजन्म में मांँ ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था। भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिये बहुत कठिन तपस्या की , इसीलिये इन्हें ब्रह्मचारिणी कहा गया। मांँ ब्रह्मचारिणी ने एक हजार वर्ष तक फल-फूल खाकर बिताये और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर जीवन निर्वाह किया। इसके बाद मांँ ने कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप को सहन करती रहीं , टूटे हुये बिल्व पत्र खाकर भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इससे भी जब भोलेनाथ प्रसन्न नहीं हुये तो उन्होने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिया और कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं , पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। मांँ ब्रह्मचारणी कठिन तपस्या के कारण बहुत कमजोर हो हो गई। इस तपस्या को देख सभी देवता , ऋषि , सिद्धगण , मुनि सभी ने सरहाना की और मनोकामना पूर्ण होने का आशीर्वाद दिया। मांँ ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। दुर्गा पूजा के दूसरे दिन देवी के इसी स्वरूप की उपासना की जाती है। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिये।
: मोक्षदायिनी है सर्वपितृ अमावस्या – अरविन्द तिवारी
Sat, Oct 14, 2023
नई दिल्ली - हिन्दू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व है , श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है जिसका मतलब है पितरों के प्रति श्रद्धा भाव। हिंदू मान्यताओं के अनुसार देह त्याग करने के बाद हमारे पुरखे परलोक सिधार जाते हैं और उनकी आत्मा की तृप्ति के लिये सच्ची श्रद्धा के साथ तर्पण किया जाता है , उसे ही श्राद्ध कहा जाता है। मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीवात्मा को मुक्ति प्रदान कर देते हैं , ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। आज इस वर्ष के पितृपक्ष का अंतिम दिवस है जिसे सर्वपितृ अमावस्या , आश्विन अमावस्या , बड़मावस , दर्श अमावस्या , महालया अमावस्या या मोक्षदायिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। पितृपक्ष या श्राद्ध पक्ष के आखिरी दिन पड़ने वाली सर्वपितृ अमावस्या को पितृ पक्ष के विसर्जन का दिन माना जाता है। इस संबंध में विस्तृत जानकारी देते हुये अरविन्द तिवारी ने बताया कि जब श्राद्ध पक्ष प्रारंभ होता है तो पितर गण मृत्यु लोक से धरती लोक में अपनी संतानों से मिलने आते हैं और आश्विन माह की अमावस्या के दिन वे वापस अपने लोक में लौट जाते हैं। माना जाता है कि जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास से नमन कर पितरों को विदा करते हैं उनके घर में सुख-शांति का आगमन होता है। पितृपक्ष के आखिरी दिन पड़ने वाली इस अमावस्या तिथि पर पिंडदान , श्राद्ध , व पितरों के निमित्त दान करने का खास महत्व होता है। आश्विन मास की अमावस्या तिथि को श्राद्ध करके पितरों को विधिपूर्वक विदाई देने की भी परंपरा है। इस दिन तर्पण , श्राद्ध और पिंडदान आदि का विशेष महत्व होता है। इस दिन पितरों के नाम से तर्पण व दान करने से पितर प्रसन्न होते हैं व अपना आशीर्वाद देते हैं। इसलिये इस दिन को सर्वपितृ विसर्जन अमावस्या श्राद्ध भी कहा जाता है। इसके दूसरे दिन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्र का प्रारंभ हो जाता है। धार्मिक मान्यतानुसार पितृपक्ष में पितर धरती पर विचरण करते हैं , अगर पितरों का श्राद्ध ना किया जाये तो उनकी आत्मा पृथ्वी पर भटकती रहती है। जिसके प्रभाव से घर-परिवार के लोगों को भी आये दिन दु:ख-तकलीफ का सामना करना पड़ता है। इसलिये बहुत जरूरी है कि अगर आप पितरों की पुण्य तिथि भूल चुके हैं तो इस तिथि पर उनका श्राद्ध अवश्य ही कर दें।मान्यताओं के अनुसार इस दिन वे लोग अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं जिनकी मृत्यु किसी महीने की अमावस्या तिथि को हुई हो या जिन्हें अपने पूर्वजों की पुण्यतिथि आदि के बारे में जानकारी नहीं होती। इस दिन हर कोई अपने पूर्वजों का श्राद्ध व पितृ तर्पण कर सकता है इसलिये इस अमावस्या को बहुत खास माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन श्राद्ध किये जाने से पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।शनिवार होने से शनिश्चरी अमावस्या भी कहलायेगीआज शनिवार को अमावस्या होने के कारण यह शनिश्चरी अमावस्या भी कहलायेगी। इस शनिश्चरी अमावस्या का महत्व कई गुना इसीलिये ज्यादा है क्योंकि ये सर्वपितृ अमावस्या के दिन पड़ रही है। इस दान दान-पुण्य करने का विशेष महत्व होता है , इस दिन दान करने से आपके पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और अगर आप पर शनि की साढ़ेसाती और शनि की ढैय्या का प्रकोप हैं तो वो कम हो जाता है।ये उपाय अवश्य करें —तर्पण करने से पूर्व हाथ में कुश की अंगूठी पहनें। इसके बाद दायें हाथ में जल , जौ और काले तिल लेकर अपना गोत्र बोलें और फिर इन चीजों को पितरों को समर्पित कर दें। पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलायें इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलेगी। आज के दिन चींटी , कौवा , गाय , कुत्ता और ब्राह्मण के नाम से भोजन निकाल दें , इससे पितरों की कृपा आप पर सदैव बनी रहेगी। आज के दिन श्राद्ध के लिये तिल और चांवल मिलाकर पिंड बनायें और पितरों को अर्पित करें। इस दिन पितरों के लिये श्राद्ध करें और घी मिली हुई खीर दान करें। इसके अलावा इस समय ब्राह्मण , गरीबों और जरूरमंदों को भोजन करायें , उन्हें अन्न और कपड़ों का दान देने से आपके सारे संकट दूर हो जायेंगे और घर में धन की कभी कमी नहीं होगी। इस दिन सुबह सूर्य देव को जल अर्पण अवश्य करें। आज पितृ अमावस्या के दिन पीपल एवं बरगद का पेंड़ अवश्य लगायें। आज के दिन पीपल पेंड़ में जल , पुष्प , अक्षत , दूध , गंगाजल , काला तिल चढ़ाकर दीपक जलाने एवं नाग स्तोत्र , महामृत्युंजय मंत्र , रूद्रसूक्त , पितृस्तोत्र , नवग्रह स्तोत्र , विष्णु मंत्र का जाप , गीता के सातवें अध्याय का पाठ करने से पितरों को शांति मिलती है एवं पितृदोष में कमी आती है। इस दिन पितरों के योगदान को याद करते हुये उनका आभार व्यक्त करना चाहिये। इस दिन पितरों को विदाई देते समय उनसे किसी भी भूल की क्षमा याचना भी करनी चाहिये।सर्व पितृ अमावस्या कथापौराणिक मान्यताओं के अनुसार श्रेष्ठ पितृ अग्निष्वात और बर्हिषपद की मानसी कन्या अक्षोदा घोर तपस्या कर रही थीं। वह तपस्या में इतनी लीन थीं कि देवताओं के एक हजार वर्ष बीत गये , उनकी तपस्या के तेज से पितृ लोक भी प्रकाशित होने लगा। प्रसन्न होकर सभी श्रेष्ठ पितृगण अक्षोदा को वरदान देने के लिये एकत्र हुये। उन्होंने अक्षोदा से कहा कि हे पुत्री ! हम सभी तुम्हारी तपस्या से अति प्रसन्न हैं , इसलिये जो चाहो वर मांग लो। लेकिन अक्षोदा ने पितरों की तरफ ध्यान नहीं दिया , वह उनमें से एक अति तेजस्वी पितृ अमावसु को अपलक निहारती रही। पितरों के बार-बार कहने पर उसने कहा हे भगवन ! क्या आप मुझे सचमुच वरदान देना चाहते हैं ? इस पर तेजस्वी पितृ अमावसु ने कहा, ‘हे अक्षोदा वरदान पर तुम्हारा अधिकार सिद्ध है , इसलिये निस्संकोच कहो। अक्षोदा ने कहा भगवन यदि आप मुझे वरदान देना ही चाहते हैं तो मैं तत्क्षण आपके साथ का आनंद चाहती हूं। अक्षोदा के इस तरह कहे जाने पर सभी पितृ क्रोधित हो गये। उन्होंने अक्षोदा को श्राप दिया कि वह पितृ लोक से पतित होकर पृथ्वी लोक पर जायेगी। पितरों के इस तरह श्राप दिये जाने पर अक्षोदा पितरों के पैरों में गिरकर रोने लगी। इस पर पितरों को दया आ गई , उन्होंने कहा कि अक्षोदा तुम पतित योनि में श्राप मिलने के कारण मत्स्य कन्या के रूप में जन्म लोगी। भगवान ब्रह्मा के वंशज महर्षि पाराशर तुम्हें पति के रूप में प्राप्त होंगे और तुम्हारे गर्भ से भगवान व्यास जन्म लेंगे। उसके उपरांत भी अन्य दिव्य वंशों में जन्म लेते हुये तुम श्राप मुक्त होकर पुन: पितृ लोक में वापस आ जाओगी। पितरों के इस तरह कहे जाने पर अक्षोदा शांत हुई। अक्षोदा के प्रणय निवेदन को अस्वीकार किये जाने पर सभी पितरों ने अमावसु की प्रशंसा की और वरदान दिया- हे अमावसु ! आपने अपने मन को भटकने नहीं दिया, इसलिये आज से यह तिथि आपके नाम अमावसु के नाम से जानी जायेगी। ऐसा कोई भी प्राणी जो वर्ष में कभी भी श्राद्ध-तर्पण नहीं करता है , अगर वह इस तिथि पर श्राद्ध पर करेगा तो उसे सभी तिथियों का पूर्ण फल प्राप्त होगा। तभी से इस तिथि का नाम अमावसु (अमावस्या) हो गया और पितरों से वरदान मिलने के फलस्वरूप अमावस्या को सर्वपितृ श्राद्ध के लिये सर्वश्रेष्ठ पुण्य फलदायी माना गया।
: निर्वाचन आयोग ने बदली राजस्थान में मतदान की तारीख
Thu, Oct 12, 2023
नई दिल्ली - निर्वाचन आयोग ने राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनाव की तारीख बदल दिया है। यह चुनाव पहले 23 नवंबर को होनी थी , अब इसे बदलकर 25 नवंबर कर दिया गया है। राजस्थान में पहले 23 नंवबर को वोटिंग होनी थी. लेकिन इस दिन देवउठनी एकादशी होने के कारण कई लोगों ने तारीख बदलने की मांग की थी। चुनाव की तारीख बदलने की मांग करने वाले लोगों में जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ अलग-अलग कारोबार से जुड़े लोग , धार्मिक-सामाजिक संगठन के लोग भी शामिल थे। अलग-अलग समूहों द्वारा की जा रही मांग को देखते हुये चुनाव आयोग ने मतदान की तिथि में बदलाव की घोषणा की। चुनाव आयोग ने पत्र जारी कर चुनाव तारीख में बदलाव की जानकारी दी। साथ ही आयोग ने इस बदलाव के पीछे की वजह बताया कि बताया कि 23 नवंबर को देवउठनी एकादशी है , इस दिन बड़ी संख्या में शादियां होती है। शादी के काम में लगने वाले लोग भी इस दिन व्यस्त होंगे , ऐसे में 23 नवंबर को मतदान का प्रतिशत कम रह सकता था। ऐसे में अलग-अलग लोगों की मांग पर चुनाव आयोग ने 23 के बदले 25 नवंबर को मतदान की तिथि घोषित की है। इसके पहले हाल ही में केंद्रीय चुनाव आयोग ने राजस्थान विधानसभा चुनाव के लिये 23 नवंबर की तारीख तय की थी। चुनाव आयोग ने मध्यप्रदेश , छत्तीसगढ़ , राजस्थान , तेलंगाना और मिजोरम में चुनाव की तारीख घोषित की थी। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में जबकि बाकी के चार राज्यों में एक चरण में चुनाव होगा। इसी कड़ी में अब नई तारीख के हिसाब से 25 नवंबर को राजस्थान में मतदान होगा , जबकि परिणाम उसी दिन 03 दिसंबर को आयेगा जिस दिन बाकी राज्यों के चुनावों की मतगणना होनी है। राजस्थान चुनाव के लिये अधिसूचना 30 अक्टूबर को जारी होगी और उम्मीद्वार 06 नवंबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे। वहीं 07 नवंबर को नामांकन की जांच होगी और नामांकन वापस लेने की आखिरी तारीख 09 नवंबर होगी। चुनाव आयोग ने यह भी बताया है कि पूरे राजस्थान में 51756 पोलिंग बूथ बनाये जायेंगे। बताते चलें कि इस समय मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार है और अशोक गहलोत प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। गहलोत की अगुवाई वाले राजस्थान विधानसभा का कार्यकाल अगले साल 14 जनवरी 2024 को पूरा हो रहा है। राज्य की 200 सीटों में से 141 सीटें सामान्य की हैं , जबकि 25 सीटें एससी और 34 एसटी के लिये रिजर्व हैं। यहां 5.25 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे , यानि कि राजस्थान में मतदाता- 5,26,80,545 युवा मतदाता- 22,04,514 हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार राजस्थान में इस बार भी सत्तासीन कांग्रेस और भाजपा से सीधा मुकाबला रहेगा। पिछले विधानसभा चुनाव में 200 सीटों में कांग्रेस को 99 जबकि भाजपा को 73 सीटें मिलीं थी। उल्लेखनीय है कि इस साल पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव की शुरुआत मिजोरम से होगी। यहां एक चरण में 07 नवंबर को वोट डाले जायेंगे। छत्तीसगढ़ में दो चरणों में 07 नवंबर और 17 नवंबर को चुनाव होंगे। मध्यप्रदेश में एक चरण में 17 नवंबर को वोटिंग होगी। वहीं अब राजस्थान में नई तारीख के साथ एक चरण में 25 नवंबर को वोट डाले जायेंगे। वहीं सबसे आखिरी तेलंगाना में 30 नवंबर को वोटिंग होगी। इन पांचों राज्यों में 03 दिसंबर को मतगणना होगी और 05 दिसंबर तक चुनावी प्रक्रिया पूर्ण कर ली जायेगी।